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मंगलवार, 3 नवंबर 2026

महिला विमर्श कार्यशाला में नारी शक्ति, सनातन संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों पर हुआ मंथन

सुलतानपुर गौर की आवाज ब्यूरो। राणा प्रताप पी जी कॉलेज, सुलतानपुर में विमर्श सुलतानपुर विभाग एवं महिला प्रकोष्ठ राणा प्रताप कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में महिला विमर्श कार्यशाला का आयोजन किया गया।…

महिला विमर्श कार्यशाला में नारी शक्ति, सनातन संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों पर हुआ मंथन
महिला विमर्श कार्यशाला में नारी शक्ति, सनातन संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों पर हुआ मंथन

सुलतानपुर गौर की आवाज ब्यूरो। राणा प्रताप पी जी कॉलेज, सुलतानपुर में विमर्श सुलतानपुर विभाग एवं महिला प्रकोष्ठ राणा प्रताप कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में महिला विमर्श कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में नारी की सामाजिक स्थिति, सनातन संस्कृति में महिला की भूमिका, महिला सशक्तिकरण, पारिवारिक मूल्यों तथा बच्चों के संस्कार और परवरिश जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। कार्यशाला को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संपर्क प्रमुख मनोज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव शक्ति, सम्मान और सृजनशीलता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। सप्तनारियों एवं त्रिदेवी की अवधारणा भारतीय परंपरा में नारी के गौरवशाली स्थान को रेखांकित करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय परिवार व्यवस्था में गृहिणी केवल घर का संचालन करने वाली नहीं, बल्कि परिवार की धुरी और संस्कारों की संवाहक होती है। उसका योगदान परिवार के निर्माण से लेकर समाज के भविष्य तक महत्वपूर्ण होता है। आज हमारे त्योहारों, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति नकारात्मक धारणाएं निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि हम अपनी संस्कृति के प्रति सजग रहें और समाज में व्याप्त कमियों को दूर करने के लिए आत्मचिंतन करते हुए स्वयं में सुधार करें। उन्होंने कहा कि नारी की उन्नति और उसकी सामाजिक स्थिति प्रत्येक देश में विकास की महत्वपूर्ण कसौटी है। वर्तमान समय में जेन जी के बीच प्रचलित ‘एक समोसा, दो पकौड़ी’ जैसी अवधारणाएं महिला-पुरुष के संबंधों को उपभोग और भेदभाव के सीमित दृष्टिकोण से देखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं। समाज को ऐसी सोच से ऊपर उठकर पारस्परिक सम्मान, समानता, सहयोग और पारिवारिक उत्तरदायित्वों को महत्व देना चाहिए।अवध प्रांत महिला विमर्श प्रमुख पायल लक्ष्मी सोनी ने अपने उद्बोधन में कहा कि सनातन संस्कृति में महिला को शक्ति स्वरूपा के रूप में स्थापित किया गया है। वर्तमान समय में फिल्मों और सोशल मीडिया के माध्यम से महिलाओं के प्रति अनेक नकारात्मक नैरेटिव प्रस्तुत किए जा रहे हैं। ‘मेरा शरीर, मेरी मर्जी’ जैसी अवधारणाओं के माध्यम से महिला जीवन को देखने का एक सीमित दृष्टिकोण विकसित किया जा रहा है। उन्होंने फिल्मों एवं विज्ञापनों में महिलाओं के वस्तुकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि महिलाओं की गरिमा, सम्मान और वास्तविक भूमिका को समझना आवश्यक है। उन्होंने बच्चों की अच्छी परवरिश, संस्कार और नैतिक मूल्यों के विकास में माताओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर विशेष बल दिया। पूर्वांचल विश्वविद्यालय की डॉ. जान्हवी श्रीवास्तव ने कहा कि महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ महिलाओं में स्वशक्ति अर्जन की भावना विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास और संस्कृति को प्रस्तुत करते हुए कई बार हमारी परंपराओं के प्रति हीन भावना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है। हमें अपने इतिहास, संस्कृति और परंपराओं का सम्यक बोध विकसित करना होगा। उन्होंने बच्चों की निरंतर काउंसलिंग, संस्कारपरक शिक्षा और पारिवारिक जीवन के प्रशिक्षण को आवश्यक बताते हुए कहा कि परिवार समाज की मूल इकाई है। कुटुंब व्यवस्था को टूटने से बचाने के लिए बच्चों को पारिवारिक दायित्वों, आपसी संबंधों और जीवन मूल्यों का प्रशिक्षण देना समय की आवश्यकता है।कार्यक्रम संयोजक महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. डीके त्रिपाठी ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया तथा अतिथियों का परिचय कराया। कार्यक्रम की सह संयोजक प्रो. निशा सिंह ने आभार ज्ञापन किया। संचालन डॉ. प्रीति प्रकाश ने किया। इस अवसर पर डॉ ए के सिंह कॉलेज की महिला शिक्षिकाएं और कार्यशाला में सैकड़ों की संख्या में प्रबुद्ध महिलाएं उपस्थित रहीं।

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